31 जुलाई 2020 - 18:30
अरब  सरकारें तेज़ी से इस्राईल से करीब हो रही हैं क्या यह सिर्फ ईरान के डर की वजह से है? रायुल यौम का जायज़ा

जुहैर एन्द्राउस ने लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र रायुल यौम में लिखा है इस्राईल और फार्स की खाड़ी के तटवर्ती अरब देशों के मध्य बढ़ती निकटता का जायज़ा लिया है।

वाशिंग्टन इन्स्टिट्यूट के एक हालिया अध्ययन में बताया गया है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान फार्स की खाड़ी के तटवर्ती अरब देशों के इस्राईल के प्रति रुख में बुनियादी बदलाव आया है। इसके साथ ही इस अध्ययन में पता चला है कि इस बदलाव को ईरान से सऊदी अरब और यूएई के डर और इस्राईल के साथ सहयोग के लालच का ही परिणाम नहीं कहा जा सकता है। बल्कि यह सरकारें इस्राईल को एक स्वाभाविक व्यापारिक पार्टनर के रूप में देखती हैं कि जिसके विचार, उनके विचारों से मिलते जुलते हैं।

सऊदी अरब और आस पास के अन्य अरब देशों की सरकारों की एक चिंता यह भी कि इस्राईल के प्रति उनके बदलते नज़रिये को कितना जन समर्थन प्राप्त होगा? वर्तमान समय में आर्थिक समस्याएं और कोरोना तथा तेल की क़ीमत में कमी की वजह से जो माहौल बना उसमें इन देशों ने इस्राईल से निकट होना उचित समझा।

किसी भी युद्ध के लिए ईरान की शक्ति कम नहीं हुई है। पिछले सितंबर में बक़ीक़ में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठान पर ड्रोन हमले, पूरी दुनिया के सैन्य संस्थानों के लिए एक बड़ा झटका था और इसी तरह इस हमले से यह विचार भी खत्म हो गया कि अमरीका जैसी बड़ी शक्तियां, अपनी अत्याधुनिक तकनीक और हथियारों की मदद से इलाक़े में अपने घटकों की सुरक्षा कर सकती हैं।

जहां तक ईरान की परमाणु महत्वकांक्षा की बात है तो वह एक अलग मुद्दा है लेकिन वह भी इन देशों के लिए चिंताजनक है हालांकि ईरान का पड़ोसी देश पाकिस्तान सन 1998 से परमाणु संपन्न देश बन चुका है और वह उच्च स्तर पर यूरेनियम के संवर्धन की क्षमता रखता है और उसने ऐसे मिसाइल बना लिये हैं जो परमाणु हथियार ले जा सकते हैं और यह सब कुछ 22 बरस पहले हो चुका है।

अमरीका में इस संस्थान के अध्ययन का सार यह है कि ईरान के साथ व्यवहार के बारे में अमरीका और ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे उसके युरोपीय घटकों के बीच मतभेद तेहरान के लिए कमज़ोरी है जो रूस और चीन को अपना मुख्य समर्थक समझता है लेकिन वाशिंग्टन के सामने सब से बड़ी चुनौती, ईरान के साथ अपनाया जाने वाला रुख है, अमरीका चाहता है कि वह ईरान के साथ ऐसा रवैया अपनाए जिसके बाद दुनिया उसे एक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण देश के रूप में देखे न एक ऐसे देश के रूप में जिसकी अतीत की शक्ति और जिसका वैभव खत्म हो चुका हो।